एकतरफा इश्क
जो आती थी पहले नज़र कभी,
शक्ल से तो वैसे ही नज़र आती हो।
देखा है आज तुमको मुद्दतों के बाद,
क्या आज भी लोगों के दिल दुखाती हो?
वो शख़्स कौन था जो था तुम्हारे साथ?
क्या उसे भी मेरी तरह समझाती हो?
जो बेफ़िक्र होकर बता देती थी मुझे सब कुछ,
क्या उसे भी इसी तरह बताती हो?
करती हो क्या उसे भी परेशान
क्या मेरी तरह उसे भी खूब सताती हो?
आज देखा तुम्हें, तो मुँह मोड़ लिया था मैंने अपना,
क्या तुम भी मुझे देखकर मुड़ जाती हो?
वो सारी बातें ज़िंदा हैं और दफ़्न भी,
क्या तुम भी हिज्र का कोई शोक मनाती हो?
कितनी बेदिल हो तुम,
जो भुलाकर हँस देती हो।
क्या दिल को इसी तरह
पत्थर बनाती हो?
अब सब खत्म है तो क्यूँ दिखती हो मुझे
क्यूँ मेरा फिर से इतना दिल दुखाती हो ?
तुम्हें तो याद भी क्यों आएगी,
ए जाना...
सिर्फ़ मुझे ही
तुम बहुत याद आती हो।
- शिनाख्त
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