तुमसे शिकायत
तू भी निकली है औरों की तरह,
ज़ुल्म किए तूने गोरों की तरह।
पूरे शहर से वाकिफ़ रहते हैं हम,
बस तुझसे वास्ता नहीं ग़ैरों की तरह।
सुना है तू किसी की नहीं सुनती,
सुनी भी मेरी तो बहरों की तरह।
तू चाँद जैसी दिखती है लोगों को,
अंदर से है तू बिल्कुल पत्थरों की तरह।
तुझे भी होगा एहसास अपने किए का,
देखेगी गोल चक्कर फेरों की तरह।
चाहे दुनिया जीते या हार जाए,
नहीं चाहिए तू अब गद्दारों की तरह।
अब तुझे लौटने की इल्तिज़ा है,
अब लौटना मत लहरों की तरह।
हरेक इंसान मार दिया है अंदर,
रहता हूँ लाशों के ढेरों की तरह।
तू थोड़ी इंसान बनना अगले जनम में,
हम तो बन चुके हैं अपने शहरों की तरह।
अब तो तुझको कुछ लिखा नहीं जाता,
तू खुद मर चुकी है मेरे शेरों की तरह।
मेरे जज़्बात न समझे तूने आखिरकार,
तू भी निकली है उन इंसानों की तरह।
- शिनाख्त
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