अपने लोग

हर हाथ दोस्ती का नहीं है मिलाने वाला 
यही अंदाज है आजकल ज़माने वाला 

हर किसी से नहीं करता अपनी बातें 
हर अपना नहीं होता गले लगाने वाला 

चाहूँ तो सबसे दूरी कर लू मैं अभी 
फिर कौन बचेगा मुझे यूं रुलाने वाला 

अपनों में अपनों को छाँटकर देखता हूँ अब 
कोई अपना ही था कल दिल दुखाने वाला 

कौन किसको रोक सका है आज तक 
जाकर ही रहता है हमेशा जाने वाला 

सफर की राहों में मिलते हैं कुछ मुसाफिर 
लगता है वही था हमेशा से अपनाने वाला 

वक्त वक्त पर अपने मिलते रहते हैं
कोई हमेशा नहीं रह पाता निभाने वाला 

- शिनाख्त 



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