क्या लिखें !
मैं ऐसा क्या लिखूँ कि कोई बात बन जाए,
मैं ऐसा क्या कहूँ कि कोई बात बन जाए।
लिखने को सिर्फ़ अल्फ़ाज़ ही हैं मेरे पास,
मैं कैसे लिखूँ कि कोई याद बन जाए।
सिर्फ़ अल्फ़ाज़ लेकर दर पर खड़ा हूँ मैं,
ऐसे कैसे लिखूँ कि जज़्बातों की रात बन जाए।
हर मंज़िल पर अपना ही पता ढूँढ़ता हूँ,
ऐसा क्या खो गया कि उसकी याद बन जाए।
कहीं से तो निकले कोई बात ऐसी,
ख़ुद की ख़ुद से कोई मुलाक़ात बन जाए
–शिनाख्त
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