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आज कल एक भँवर में फँसकर बैठा हूँ

गौर से सुनो जो मैं हँसकर कहता हूँ


रोज़ एक जंग से गुज़रती है मेरी तबीयत

मैं दिल पर एक बोझ लेकर रहता हूँ


कोशिश करता रहता हूँ बाहर आने की मगर

न जाने किस ज़मीन में धँसकर बैठा हूँ


कोई मुझसे कुछ भी कहे अब, नासिर

मैं भी अपनी धुन में अक्सर रहता हूँ


एक जुनून की आग पली हुई है ज़ेहन में

कुछ भी हो जाए, ख़ुद को हँसकर सहता हूँ


ये भँवर चाहे हो कितना भी गहरा

अपने इरादों के साथ अब डटकर रहता हूँ।


–शिनाख्त 

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