इश्क़ का वहम

मेरा वहम है कि हर किसी को पा लूंगा
कब तलक झूठ से खुद को यूँ बहला लूंगा

जिसे चाहा इतने दिल से, उसे पा न सका
फिर कैसे किसी और से दिल लगा लूंगा 

यूँ तो बदनाम हैं दुनिया में हज़ारों ज़हर 
मगर मैं महफ़िलों में बस तेरा नशा लूंगा

मेरा वहम है या कोई सच में चाहे मुझे
इसी उलझन में खुद को ताउम्र उलझा लूंगा

ये जो मुझे रोज़ मुस्कुराकर देखा करती हैं
क्या उन्हें अपना टूटा सा दिल दिखा लूंगा

जब अपनों से ही दिल की बात हो न सकी
फिर मैं गैरों से भला दर्द की क्या दवा लूंगा

- शिनाख्त 

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