पैसे बनाम वक्त

बिखरा-बिखरा रहता है दिन जैसे,

बेचकर आत्मा कमाता हूँ पैसे।


किसी से मिलता, बैठकर बातें करता,

दिल खिलता है, पर थोड़ा-सा काम करता।


जीना चाहता था ऐसी ज़िंदगी,

पर ज़िंदा नहीं रह पाता मैं ऐसे।


ये पैसे की दौड़ है, मारी है इंसानियत,

बिना कमाए भी तो बचता कैसे?


रहता हूँ दुखी किसी को वक़्त न दे पाने पर,

जब देता हूँ वक़्त, खर्च होते हैं पैसे।


वक़्त जाया होता रहा इन्हीं कामों में,

आख़िर में न रहा वक़्त, न बचे पैसे।


- शिनाख्त

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