काम ही काम
तन्हाई का कैसा आलम बिखरा है,
क्या पता कब चाँद निकला है।
क्या पता कब चाँद निकला है।
कट रही है ज़िंदगी गुमनामी में,
ये मेरी अधूरी ग़ज़ल का मिसरा है।
मैं काम में मसरूफ़ हूँ इस क़दर,
मेरे घर में दिल का सामान बिक रहा है।
कभी-कभी याद भी आती है,
पर दिल मेरा न जाने कहाँ निकला है।
वैसे तो जिस्मानी ज़रूरत की भी बात है यहाँ,
पर अब मेरा मन कहीं और ही फिसला है।
क़ीमत चुकानी पड़ती है नाम की,इश्क़ गँवा कर,
यहाँ कब कोई मेरे लिए मरा है।
अब जैसे हालात में खड़ा हूँ अभी,
मेरा सूरज काम ख़त्म करके ही निकला है।
- शिनाख्त
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