Faiz couplet
Some time ago, Faiz wrote about the failure of love in his couplets.
दोनों जहाँ तेरी मोहब्बत में हार के
वो जा रहा है शमे ग़म गुजार के
वीरान है मैकदा, खुमो सागर उदास हैं
तुम क्या गए कि रूठ गए दिन बहार के।
So I will try to write next about it.
अंदर एक काँच टूटा सा है
ज़ेहन मेरा मुझसे रूठा सा है
तू है कहाँ पता नहीं
मेरा दामन तुझसे छूटा सा है
मेरा दामन तुझसे छूटा सा है
मिल जाएगा प्यार आसानी से
अपने जैसा प्यार मिलना झूठा सा है
देखो कैसे जी रहा हूँ इस ज़माने में
दिमाग ऊंगलियाँ हैं दिल अंगूठा सा है
कब आएगी बहार क्या पता
कहते हैं लोग इंसान थोड़ा अनूठा सा है।
-शिनाख्त.
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