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अभागा मैं

हर किसी को प्यार नहीं मिलता यहां  रह जाता हम जैसा कोई दीवाना यहां इस दुनिया से उठने वाला है दिल मेरा  रोक ले कोई उठने से मेरा जनाज़ा यहां कोई क्यूं प्यार करेगा इस शक्स को  मुझसे पहले मरा हुआ है जमाना यहां हो सकता है कोई दिलकश भी बची हो  हो सकता है कोई महफ़ूज़ भी रखी हो  आयेगा मेरे हक में कैसे किसी का प्यार  रखता हूँ जो खुद का बंद कमरा यहां सोचता हूं खुल जाऊँ अपने लोगों से पहचानता नहीं कौन है अपना यहां वैसे तो डर नहीं है कुछ खास मुझे पर  डरता हु बन जायेगा मेरा तमाशा यहां  इसी गुमनामी में दुखता है दिल मेरा रह गया हूँ जो सबसे अभागा यहां मन नहीं करता इस ज़माने में रहने का  रह गया हूँ जो ज़माने से बेगाना यहां - शिनाख्त

you are good bro

I'm not writing today to correct myself, nor am I complaining about myself. Today, I experimented a lot. I approached people, asked women out, and put myself in situations I usually wouldn't. And honestly, I'm not disappointed. Instead, I learned a few things about myself and how the world works. The first thing I realised is that I crave sexual experiences. I don't know whether it's testosterone or something else, but I often find myself looking for women, craving sexual pleasure and wanting to experience intimacy. Sometimes, I tell myself not to watch too much porn. Other times, I think about masturbating without porn. But the desire keeps coming back, and I'm trying to understand where it comes from and what I'm actually looking for. The second thing I realised is that finding a girlfriend requires more than simply approaching someone you find attractive. It requires a social environment where you can meet people regularly, interact with them, and gradu...

अंत

मुझ जैसा तुझे कोई और न मिले इश्क का ऐसा कभी दौर न मिले  रहे खुश हमेशा मेरे जाने के बाद  ज़िंदगी में गम का कभी शोर न मिले तेरी बिदाई जो जाए मेरी यादों से भी मुझे वो उम्मीदों का भी शोर न मिले खिलखिलाए हमेशा चाँद की तरह तू  तेरी रातों को इस अमावस की कभी भोर न मिले  जैसी ज़िंदगी चाहे तू वैसी जिये  मेरी जिंदगी में कभी चकोर न मिले मैं जो मर चुका हूं वो ही अच्छा है मुझ जैसा तुझे कभी शौहर न मिले मुझे मौत आये तो बस उम्र से  और तुझे मजबूरी में भी जौहर न मिले  हो जाएं तेरे रास्ते हमेशा अलग मुझसे  मेरे रास्तों की तुझे कभी छोर न मिले मेरा दिल बन चुका है पत्थर अब इसे पिघलाने वाला कोई घन घोर न मिले जो दिल ले गई थी, दफना देना उसे टूटी चीजों का कहीं जोड़ न मिले  मैं मर के उड़ूंगा हवाओं में  मुझे बीते वक्त की कभी डोर न मिले अब आए ज़माने भर से बारात मेरी दुश्मन कोई मुझे अब कमज़ोर न मिले  अब आएगा मजा जीने में इस कदर बाग जैसे मिलेगा सब पर मोर न मिले मैं जिऊंगा बेधड़क जैसे दिल गया दिखाऊँगा क्यूं मुझ जैसा अब और न मिले जिस दिन उठेगा जनाज़ा मेरा शहर से कंधे दे...

खुद के साथ

ज़िंदगी देखने की आदत डालो सारे वहम अपने खुद ही निकालो मत भागो डर से इतना दूर  आये जब मौत तब दाँत निकालो डरो मत अकेलेपन और खालीपन से उनको तो अपना जिगरी दोस्त बना लो करो खुद को बुलंद इतना कि  जब बोलो तब मुंह से आग निकालो खुद से भागने की क्या कोशिश  खुद के साथ अपनी जिंदगी बना लो  - शिनाख्त 

खाली बैठो

अक्सर आजकल खाली बैठा रहता हूँ मैं  न जाने खुदसे क्या कहता रहता हूँ मैं लोगों से भर गया है घर मेरा आजकल ऐसे घर में अकेला अकेला रहता हूँ मैं न जाने कितनी दिक्कतें और आएंगी सब कुछ जो अकेले सहता रहता हूँ मैं हिम्मत न हारो, सब्र पालो, सबका वक्त आता है सबसे आजकल यही कहता रहता हूँ मैं अब छोड़ देता हूं जब मन नहीं लगता खुद को इतना भी नहीं कहता रहता हूँ मैं पढ़ने में मन नहीं लगता तो खाली बैठ जाता हूं ऐसे वक्त में कुछ नहीं करता रहता हूँ मैं बुकौस्की की ये बात मानता हूं मन के लिए बिना कोशिश किए खाली बैठा रहता हूँ मैं - शिनाख्त

curiosity is the way for making mood.

आंखों देखी

अपनों को बदलते देख रहा हूँ, जैसे-जैसे वक़्त को निकलते देख रहा हूँ। मैं बिगड़ा हूँ इस क़दर कि अब, ख़ुद को सँभलते देख रहा हूँ। कुछ अपनो को दिल से उतरते देख रहा हूँ, कुछ ग़ैरों को दिल में उतरते देख रहा हूँ। जो सोया नहीं हूं इतनी रातों से सूरज जो अपना निकलते देख रहा हूँ। इतना दुखी जो होकर बैठा रहता हूँ  अपनी ही शामों को ढलते देख रहा हूँ। वो जो सोचकर बैठ गया था दिल मेरा, आज उसको भी वहाँ से चलते देख रहा हूँ। मैं तो अर्पण कर आया था सब कुछ, अब गंगा में हाथ मलते देख रहा हूँ। ये कैसी दुनिया है, जिसे बिखरते देख रहा हूँ, क्यों फिर भी ख़ुद को निखरते देख रहा हूँ । - शिनाख्त